भारत भूमि पर सदियों से मानव दुःख को कम करने के लिए महापुरुषो ने अवतार लिए है और मानव दुःख हरण करके का कार्य किया है तो वही कई दानवीर भी इसी भारतभूमि पर दान दिए है पुरानो के अनुशार राजा बलि सबसे बड़ा दानी माना गया है, जिसके बाद दूसरा नाम कुंतीपुत्र कर्ण का आता है इसके बाद कई दानदाताओ ने दान करते हुए अपना नाम इतिहास के पन्नो पर स्वर्ण अक्षरों में दर्ज करवाया है|
2022 की लिस्ट में देखे तो भारत के शिव नाडर ने 1.161 करोड़ की सम्पत्ति दान दे कर अपना नाम दर्ज करवाया है तो वही दुसरे पायदान पर अजीम प्रेमजी का नाम आता है| ये सभी दानवीर भारत भूमि पर ही दान दिए है| वही अपने बिहार झारखण्ड में देखे तो अब तक का सबसे बड़ा दान विनोवा ने दिया है| और अब भी कई दान वीर है जो जो समय समय पर दान देते रहते है|
परन्तु इस लेख में हम एक इलाके के एक ऐसे दानवीर की चर्चा करने जा रहे है जो अपना नाम दानवीर में दर्ज करवाने की होड़ में क्या क्या न कर गए| भला अब किसे अपना नाम स्वर्ण में लिखवाना पसंद न हो|
मामला एक दूर के इलाके से जुड़ा है जिसे बड़े जमीनदार रहे श्री सिंह द्वारा बड़े कार्यो हेतु भूमि दान महा विद्यालय को दी थी | इस दान के बाद महा विद्यालय के परिषद ने एक पत्र जारी करते हुए श्री सिंह को महा विद्यालय में प्रथम दानदाता के रूप में घोषित कर दिया | अब श्री सिंह को उन्हें लगा उनका नाम स्वर्ण अक्षर में लिखा गया , इस बात से वह काफी खुश थे, एक दिन एक व्यक्ति ने उस विद्यालय से पूछ लिया तो वही दूसरी ओर महविद्यालय के द्वारा उस व्यक्ति को बताया कि महाविद्यालय को कोई भी भूमि दान स्वरुप प्राप्त नहीं है| बल्कि वह विक्रय स्वरुप प्राप्त है| महाविद्यालय ने यह भी बताया है कि हमारे यहाँ एक चतुर्थवर्गीय कर्मचारी श्री छोटे सिंह को इस लिए नोकरी दे दिया गया है क्योकि उसने महाविद्यालय को रियायत दर पर भूमि उपलब्ध करवाया था| अब इतना होने के बाद श्री सिंह द्वारा परिषद् के को लिख कर बताया की महाविद्यालय ने जो जानकारी दी है वह गलत है| मामला था की उनका नाम स्वर्ण अक्षर से हटा दिया जाता|
अब दान दिए है तो नाम तो श्री सिंह का होना चाहिए | नहीं हो रहा है तो तकलीफ तो होगा ही | अब श्री सिंह के पास इतनी जमीन है कि वह बड़े बड़े दान दे कर अपना नाम उनके इलाके में स्वर्ण अक्षर में लिखा जा सकता है परन्तु दुर्भाग्य है इस इलाके वासियों का कि श्री सिंह का नाम बढ़ने ही नहीं दे रहे है| बार बार व्यवधान उत्पन्न हो जात है| जैसे महाविद्यालय ने भी लिख कर बता दिया है कि हमें कुछ भी दान प्राप्त नहीं है|
श्री सिंह की संपत्ति देखा जाए तो इलाके के मुख्य मार्ग के समीप कई एकड़ की एक बड़ी भु भाग उपलब्ध थी| जिसे वह धीरे धीरे ही सही परन्तु चार दिवारी से घेरने का प्रयास तो कर ही रहे थे| अब भला हो नगर वासियों का जिनकी काली नज़र इनकी संपत्ति पर पड़ गया और बार बार श्री सिंह को जाँच के दायरें में ले आने लगे |
श्री सिंह के दया भाव इतने ऊँचे थे कि उनेक पडोशी रहे श्री विश्वकर्मा के घर आने जाने वाले दो गज के रस्ते को बंद कर के उस जमीन को अपने कब्जे में कर के थोडा और जमीन बढ़ा लिया है जो भविष्य में दान देने के काम आयेंगे|
श्री सिंह की चिंता बस इतनी है की जमीन भी हमारे पास रहे और दानदाता सूचि में मेरा नाम इलाके में स्वर्ण अक्षर में लिखा जाए| और इस काम को बेहतर करने करने के लिए उन्होंने अपने पास कुछ भी नहीं रखा एक बेहतर उपाय के साथ उन्होंने अपने रिश्तेदारों पड़ोसियों के हिस्से की भी जमीन अपनी पत्नी के नाम दान दे दिए ताकि समय आने पर उन्हें एक बड़े दाना दाता के रूप में घोषित कर दिया जाए|
यह कहानी किसी व्यक्ति या घटना से सम्बंधित नहीं है| अगर होता है तो वह महज एक संयोग होगा| यह लेखक के अपने निजी रचना है|

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