आइये रमजान के महीने में राम को जानने और समझने की एक कोशिश करते है| कबीर के शब्दो में देखे तो कबीर ने राम को कई रूपों में देखा है|

कबीर कहते है

एक राम दसरथ का बेटा,

एक राम घट घट में बैठा

एक राम है सकल पसारा

एक राम है सबसे न्यारा

कबीर अपने दोहे में चार राम का जिक्र करते है जिससे यह स्पष्ट है कि दुनिया जिस राम को जानती है समझती है वह दसरथ पुत्र राजा राम चद्र जी के दर्शन से जुड़ा हुआ है| परन्तु कबीर अध्यात्म रूपी राम से मानव का परिचय कराना चाहते है जो जीवंत चेतना है| जो हर चेतन के साथ जुड़ा है| कबीर जिस राम का जिक्र कर रहे है वह कोई मजहब का नहीं है वह किसी धर्म का नहीं है| वह सर्वव्यापी राम है जिसे दुनिया कर हर व्यक्ति जो आस्तिक है वह उसे पाने की तलाश में है| कबीर ने हिन्दू और मुस्लमान दोनों के धर्म की आलोचना करते हुए कहा है

हिन्दू कहे मोहे राम प्यारा, तुरक कहे रहमाना|

आपस में दोउ लड़ मुए, मर्म ना कोई जाना||

यहाँ पर कबीर हिन्दू मुस्लमान दोनों को चेतावनी देते हुए कहते है कि इन्सान रूपी राम को आज मानव बता कर हिन्दू और मुसलमान के नाम पर झगडा फसाद फैलाये हुए है परन्तु  दोनों राम को नहीं पहचाते है यहाँ पर कबीर तीसरे राम का जिक्र कर रहे है जहा पर हर इन्सान के अन्दर बैठे राम को जानने और उसे समझने को कह रहे है|

अब चर्चा करते है रमजान या रमदान उर्दू अरबी शब्द से लिया गया है जो इस्लामिक पंचांग का नौवा महीना है जिसे पवित्र माह के रूप में जाना जाता है यह महीना इस्लाम की मूल नियम को बताता है यह कहता है की एतेकाफ़ बैठना यानी गाँव और लोगो की अभ्युन्न्ती व् कल्याण के लिए अल्लाह से दुआ करते हुए मौन व्रत रखना| जकात देना, और अल्लाह का धन्यवाद करना कुल मिला कर जितने भी पाक काम है उसे करने को प्रेरित करता यह महीना अल्लाह के इबादत के लिए माना जाता है इस माह में कुरआन को पढना भी पुन्य का काम माना जाता है रमजान का महीना माह ए सियाम भी कहा जाता है जहा लोग 29 दिन तक सियाम में रहते है जिसे रोजा भी कहा जात है।

 

इस माह को मुहम्मद (सल्ला) ने फरमाया है जो शख्स नमाज के रोजे ईमान और एहतेसाब से रखे उसे सब कुछ पिछले गुनाह माफ़ कर दिए जायेंगे| रोजा हमें जब्ते नफ्स ( खुद पर काबू) की तरबियत देता है| हममे परहेजगारी पैदा करता है| लेकिन अब जैसे ही माह एक रमजान आता है तो आम लोगो के जेहन में तरह तरह के चटपटे और मजेदार खाने का तसव्वोर आ जाता है और लोग नबी को भूल कर बस रमजान के दिन गिन कर गुजार देते है| वही दूसरी तरफ़ हिन्दू धर्म में देखे तो कई ऋषि महर्षि भी खुद को काबू करने के लिए कई कठोर यज्ञ और तपश्या करते है ताकि वह खुद को नियंत्रित कर सके परन्तु वह नियंत्रण करना हर किसी के बस की बात नहीं होती है|

 

मतलब दोनों के पास वो सहनशक्ति नहीं है जो वह जिस भी हाल में है ईश्वर के करीब है| और लोग हमेश ईश्वर को कड़े नियम की तो कभी उनके करम की दुहाई देते नज़र आते है|  

 

गीता के छठे अध्याय में श्रीकृष्ण कहते हैं- जब मनुष्य निष्कपट हितैषियों, प्रिय मित्रों, तटस्थों, मध्यस्थों, ईर्ष्यालुओं, शत्रुओं तथा मित्रों को समान भाव से देखता है, तो वह और भी उन्नत माना जाता है।स्पष्ट है कि हमारे सांसारिक संबंध कैसे भी हों, पर हमारे व्यवहार में समानता का भाव होना चाहिए वही मेरा मार्ग है अर्थात राम का मार्ग|

दुनिया में समानता का विचार आधुनिक काल की देन माना जाता है, किंतु भारत में श्रीमद‌्भगवद‌्गीता में समानता का विचार अद्भुत ढंग से प्रस्तुत हुआ है। हालांकि कोई धर्म आपस में भेदभाव के लिए प्रेरित नहीं करता। फिर भी आज पढ़े-लिखे समाज में भी जाति भेद शिखर पर है। मनुष्य समय पड़ने पर अपनी नस्ल, जाति, भाषा और धर्म से अलग व्यक्ति पर प्रतिकूल टिप्पणी करता है। हिन्दू-मुस्लिम, ब्राह्मण-शूद्र, शाकाहारी-मांसाहारी, साधारण जाति-अनुसूचित जाति, उच्चवर्ग-निम्नवर्ग भाषाओं की अलग तना-तनी है।

धर्म के नाम पर आज समाज बंटा हुआ है। एक जाति के लोग दूसरी जाति से भेदभाव रखते हैं, उन्हें लगता है कि सिर्फ उनके धर्म? संप्रदाय? समाज का व्‍यक्ति ही उनका हित कर सकता है। यह सोच बिलकुल गलत है और इसी विभेद का लाभ उठाया जाता है। बंटे हुए समाज को और बांटने का प्रबंध किया जाता है। धर्म को लेकर अक्सर लोगों में वाद-विवाद होता रहता है।

इसी का नतीजा है कि हम एक बार फिर से उस दोराहे पर खड़े हैं, जहा हम राम से विस्मृत हो कर समाज और सप्रदाय में बंट जाते है,

स्वामी विवेकानंद ने कहा है- सभी धर्मों का गंतव्य स्थान एक है। जिस प्रकार विभिन्न मार्गों से बहती हुई नदियां समुद्र में जाकर गिरती हैं, उसी प्रकार सब मत-मतांतर परमात्मा की ओर ले जाते हैं। मानव धर्म एक है, मानव जाति एक है।

हमारी पवित्र पुस्तकें कुरान, गीता, रामायण या बाइबल में इंसानियत की सीख दी गई है। फिर इस अमूल्य सीख से बेखबर हमारे धर्माधिकारी तक विवादास्पद बयान दे देते हैं जिसका ज्यादा नुकसान मासूम आवाम को होता है। ऐसा समाज जहां इंसानियत ही हमारा धर्म हो, इसके लिए जरूरी है कि हम पहले इंसान बन जाएं। जो सब धर्मों से ऊपर है।जिसका जिक्र कबीर भी करते है, आज स्थिति इसके विपरीत है। सबसे बुद्धिमान कहा जाने वाला मनुष्य ही आज शांति के चमन को भेद-भाव की दूषित मानसिकता से नष्ट कर रहा है। यह हमारे अज्ञानता में जीने का सबूत नहीं तो और क्या है?


- ओंकार विश्वकर्मा