radha krishna 

 

कथित धर्म गुरुओं ने इस संसार को नर्क बताया है और यहाँ ईश्वर प्राप्ति के कई कठिन मार्ग बता कर जन मानस को भ्रमित किया गया है, यह कोई नई परम्परा नहीं है यह सदियों से चला आ रहा है, मोक्ष और मुक्ति हर गुरु की व्यक्तिगत अनुभव पर आधारित रहा है, और यह विडम्बना सिर्फ एक धर्म में है यह भी नहीं है यह सभी धर्म में आज भी कायम है, कहीं लोगो को आयत, और सूरा पढ़ा कर अल्लाह को रिझाने की बात कही गई है, तो कही मंत्रोचारण और विविध विधि विधान से पूजन की बात कहते हुए ईश्वर प्राप्ति के मार्ग बताये गए है,  ईश्वर की तलाश में कोई काबा जा रहा है तो कोई ईश्वर के तलाश में चारो धाम की यात्रा कर रहा है, पर इन सब से ऊपर उठ कर संत कबीर कहते है:-

मो को कहाँ ढूंढता बन्दे मै तो तेरे पास हूँ,

न मै मंदिर न मै मस्जिद न काबा कैलाश हूँ |

यह पंक्ति इस बात को सार्थक करता है कि तुम हमें कहाँ ढूंढ रहे हो मै तुम्हारे पास हूँ मै किसी मंदिर मस्जिद या गुरुद्वारे में नहीं मिल सकता,

फिर ईश्वर से मिलन और उनसे मिलने पर मांग की एक परम इच्छा आदि काल से रावण काल होते हुए अब तक चला ही चला आ रहा है, परन्तु रावण ने ईश्वर से जो वरदान प्राप्त किये वह आज के मानव के लिए भी संभव है, और इसकी मांग के लिए आज लोग दर दर जा कर अपने मनोकानमा को पूर्ण करने हेतु ईश्वर को ढेर सारे उपहार और जीव की बलि देने की शर्त दे आते है, ऐसे में क्या हम ईश्वर की प्राप्ति कर रहे है या अपने शर्तो पर आधारित ईश्वर के कल्पना के साथ जी रहे है?

इस भारत भूमि पर कई महान संतो ने जन्म लिया और समय समय पर भारत के संस्कृति और परम्परा को जीवंत बनाया उन्ही चुनिन्दा संतो की श्रेणी में , कबीर, मीरा, रैदास, तुलसी, अमीर खुसरो, निजाम, रहे और उन्होंने भी इश्वर प्राप्ति के अध्यात्मिक रास्ते बताए जो शायद अब प्रचलन ने नहीं है परन्तु आज भी सूफी संत और उनके परंपरा को मानने वाले लोग अन्तर्मुखी हो कर सूफी मार्ग के रस्ते ईश्वर की अनुभूति तक पहुचने के लिए प्रयास कर रहे है |

तभी तो तुलसी ने कहा कि

राम नाम रटते रहो, जब तक घट में प्राण,|

कबहूँ तो दीन दयाल के भनक पड़ेगी कान ||

 अर्तात आप अपने आराध्य को हर पल याद करते रहिये कभी तो सुनेंगे और आप पर उनकी कृपा होगी|

तो वही खुसरो के शब्दों में

खुसरो दरिया प्रेम का, उल्टी वा की धार।

जो निकला सो डूब गया, जो डूबा सो पार।।

खुसरो कहते है प्रेम की दरिया वह दरिया है जिसकी धार हमेशा उल्टी बहती है, और इस दरिया में जो डूबता है वही पार होता है, और निकलता है डूब जाता है,

तो इसी बात को आगे कबीर कहते है

पोथी पढ़ि-पढ़ि जग मुआ, पंडित भया न कोय।

ढाई आखर प्रेम का, पढ़े सो पंडित होय।"

अर्तात प्रेम इश्वर तक पहुचने का एक सरल माध्यम है, जहाँ पर आप सिर्फ समर्पण की अनुभूति के साथ उसके दरिया में डूब जाइए, बाकी इश्वर आपकी नैया पार कर देगी| जहाँ न कोई  मांग होगा, न कोई इच्छा, न कोई अभिलाषा, न कोई दुःख, न कोई सुख, बस एक ही अनुभूति होगी की आप परमानन्द के साथ है, और आप करुनामय हो कर बस उस अनुभूति को महसुस कर पा रहे है, जहाँ पर न धन की इच्छा है न रावन जैसे दस शीश की अभिलाषा, न कोई पद की, न कोई अप्सरा की, जो प्रेम की अनुभूति मीरा ने प्राप्त की  वह प्रेम तक अपने दिल से हो कर जाने की रास्ते को ही प्रेम का मार्ग बताया गया है| जहाँ मांग शून्य है और समर्पण सर्वश्व, वही ईश्वर और मोक्ष की परम अनुभूति की प्राप्ति संभव है|

 _ Onkar