ईश्वर के अस्तित्व पर हाल ही में द लल्लन टॉप  पर दो हस्तियों के बीच एक बहस हुई। यह स्पष्ट है कि ऐसी कोई भी बहस ईश्वर के होने या न होने को निर्णायक रूप से सिद्ध नहीं कर सकती। भविष्य के गर्भ में क्या छिपा है और अतीत के तहखानों में क्या दबा हैयह सब तर्क, विश्लेषण और देखने वाले के नज़रिये पर निर्भर करता है।

दुनिया की शुरुआत और अंत की व्याख्या अलग-अलग धर्मों ने अपने-अपने ढंग से की है। किसी ने इसे क़यामत कहा, तो किसी ने महाप्रलय। धर्मग्रंथों में इन अवधारणाओं को अलग-अलग रूपों में प्रस्तुत किया गया है।

डर और धर्म का उदय

यदि हम मानव इतिहास पर नज़र डालें, तो पाएँगे कि धर्म के उदय के प्रमुख कारणों में से एक डर भी रहा है। सभ्यता के आरंभिक दौर में आग की खोज और पहिये का आविष्कार मानव विकास की बड़ी क्रांतियाँ थीं। यहीं से प्रश्नों का जन्म हुआऔर जिनके मन में प्रश्न उठते गए, उन्होंने नई खोजें कीं।

लेकिन इसी विकास के साथ डर भी पैदा हुआ। खेती की शुरुआत हुई, कबीले बने, और तभी प्राकृतिक आपदाएँ आईंभीषण बाढ़ ने फसलें नष्ट कीं, आग ने लोगों को जला दिया, तेज़ आँधियों ने घर उजाड़ दिए। लोग डर गए।
और जिस-जिस चीज़ से डर लगे, उसी-उसी को पूजना शुरू कर दिया गया।

यहीं से ईश्वर की अवधारणा का क्रमिक उदय हुआ। बुद्धिमानों ने इस डर को सामाजिक व्यवस्था में लागू कर दिया। डर के कारण बच्चों को धर्म और मज़हब के दलदल में धकेला गया, मज़हबी तालीम दी गई और आज्ञाकारी धार्मिक मानसिकता गढ़ी गई।

धीरे-धीरे डरने अपना एक साम्राज्य खड़ा कर लियाचाहे वह पूँजीवाद हो, बाज़ारवाद हो या ईश्वरवाद।
पूजने वालों की संख्या अधिक होना किसी विचार को सार्वभौमिक सत्य नहीं बना देता।

जिसने इस डर की पहचान कर ली, वही मानव समाज पर शासन करने लगा। आगे चलकर इसी डर का उपयोग समाज को जातियों, वर्गों और कोटियों में बाँटने और शोषण करने के लिए किया गया।

रजनीश का व्यंग्य याद आता है

भारत में इतने ईश्वर हो गए हैं कि अब ईश्वर भी ट्रैफिक जाम में फँस गया है कि कब, किसकी मदद के लिए, कहाँ जाए।

यह स्थिति किसी एक धर्म तक सीमित नहीं है; लगभग सभी धर्मों में यह समस्या मौजूद है।

भारतीय दर्शन और ईश्वर का प्रश्न

भारतीय दर्शन में ईश्वर के अस्तित्व का प्रश्न सदियों से विवादास्पद रहा है।
हिंदू दर्शन के कुछ स्कूल ईश्वर को परम चेतना या ब्रह्म के रूप में स्वीकार करते हैं, जबकि चार्वाक जैसे मत ईश्वर को पूरी तरह नकारते हैं।

वेदांत और उपनिषदों में ईश्वर को अस्तित्व का स्वरूप माना गया हैयहाँ यह कहना कि ईश्वर नहीं है”, उसी तरह माना जाता है जैसे कहना कि अस्तित्व नहीं है
भगवद्गीता में ईश्वर को सर्वज्ञ-सर्वशक्तिमान बुद्धि के रूप में प्रस्तुत किया गया है, जो ब्रह्मांड के नियमों में प्रकट होता है।

सांख्य दर्शन में ईश्वर की भूमिका सीमित है और मोक्ष आत्म-ज्ञान से प्राप्त होता है।
जैन और बौद्ध दर्शन ईश्वर को नहीं मानते, पर वे केवल भौतिकवादी भी नहीं हैंवे आत्मा और नैतिकता को स्वीकार करते हैं।

वैशेषिक दर्शन में ईश्वर सृष्टि के बाद निष्क्रिय हो जाता है, जो आधुनिक Deism से मिलता-जुलता है।
विष्णु पुराण, कबीर के दोहे, “एक ओंकारऔर सूफी परंपरा ईश्वर को एकता और प्रेम के रूप में प्रस्तुत करते हैं।

अंततः, ईश्वर का अस्तित्व व्यक्ति के अनुभव, भक्ति या दार्शनिक विवेचना पर निर्भर करता है।

सोशल मीडिया की अंधी भीड़

इस शो में हुई बहस के बाद एक विशेष समुदाय ने अपने मज़हब को श्रेष्ठ साबित करने के लिए सोशल मीडिया पर कौवों की जमात खड़ी कर दी।
एक विशेष व्यक्ति की इस तरह प्रशंसा की जा रही है जैसे वह कोई आने वाला पैगंबर या सुपरहीरो हो।

ऐसे अंध समर्थकों की यह भीड़ आने वाली पीढ़ियों को गलत तर्कों और बौद्धिक अंधकार की ओर ले जाएगी। यह एक नई अंधी दुनिया के निर्माण में योगदान दे रही हैजो अंततः मानवता के लिए ख़तरनाक सिद्ध हो सकती है।

- ओंकार विश्वकर्मा 

मानव अधिकार कार्यकर्ता